भक्ति: प्रेम की धारा
भक्ति, इस असीम प्रेम की एक धारा है। यह मांग अवरुद्ध होकर, केवल स्वयं के अभिमुखता में पूर्ण रूप से बढ़ती है। साधारण मनुष्य, स्वयं के जीवन में अतः अतिशय जागरूकता के अधिकार के अवस्था में, खुद की सारी भावनाएँ वैर देता है, और असीम उत्तरांश के साथ भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। यह एक दर्शन है, जो जीवन को एक अविस्मरणीय दान बनाता है।
भक्तियोग: रास्ता और कीर्ति
भक्तियोग, अस्तित्व के श्रेष्ठ मार्गों में से एक है, जो अतुलनीय परमानंद की प्राप्ति के लिए सीधा रास्ता प्रदान करता है। यह अथवा ज्ञान का नहीं है, बल्कि उत्साह और आत्मा के गहन जुड़ाव का होना है। बहुत से योगि ने इस महान योग का अनुभव किया है, और यह अनुमानित है कि इस प्रक्रिया से अविरत प्रगति होती है, और मन को नियंत्रण में होना संभव है। यह होने उच्च अनुभव है, जो भक्त को मोक्ष की ओर धो जाता है।
भक्ति का स्वरूप
भक्ति, होने का अमूल्य भाव है, जो हृदय की निजी भावनाओं से जन्म लेता है। यह मात्र किसी ईष्ट के प्रति निष्ठावान प्रेम का नही है, बल्कि उसके जुड़ाव की होने की इच्छा से रचना होती है। विभिन्न शास्त्रों में भक्ति के विभिन्न रूपों का विवरण मिलता है, जिनमें आसानी, आस्था, और त्याग जैसे गुण प्रमुख रूप से मिलते हैं। सच्ची भक्ति व्यक्तिगत अनुभव की गहराई है, और यह किसी विधि या पाठ्यक्रम से निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह सुख की अनंत यात्रा है, जो आओ विमुक्ति की ओर खड़े जाती है।
भक्ति और कर्म
भक्ति और कार्य दो ऐसे अंश हैं जो भारतीय परंपरा में गहराई से मिलते हुए हैं। अक्सर इसे एक दूसरे के विपरीत के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में, वास्तविक बोध यह है कि वे एक दूसरे Bhakti को पूरक हैं। भक्ति का रास्ता हमें प्रकार्यों के बन्धन से मोचित दिलाने में उपयोगी हो सकता है, और सेवा हमें आस्था के प्रतिष्ठापन में सहयोग करती है। इसलिए, भक्ति और कर्म एक दूसरे के साथ चलना चाहिए, ताकि चित्त को मुक्ति की ओर अग्रसर मिल सके। यह आवश्यक है कि केवल प्रेम से या केवल कर्म से परिणाम प्राप्त नहीं हो सकती। अतः का संतुलन आवश्यक है।
समाधि में भक्ति
श्रद्धा का गहरा रूप समाधि है। यह असाधारण अनुभव है, जिसमें चित्त पूरी तरह से राम में लीन हो जाता है। यह अवस्था प्रेम के उत्कृष्ट अवस्थाओं में से एक है, जहाँ साधक स्वयं के शरीर और जग को छोड़ देते है। बहुत सारे संतों ने यह समाधि में अप्रमेय सुख अनुभव किया है, और उसकी विवरण करना असंभव है। समाधि साधक के अंदरूनी प्रकृति को प्रकट करती है।
भक्ति का इतिहास
प्राचीन लोकजीवन में, भक्ति आंदोलन का पथ अत्यंत प्राचीन है। यह प्रारंभिक काल से ही भावनात्मक संबंध और भगवान के प्रति भक्ती को व्यक्त करने का एक मुख्य तरीका रहा है। शैव आस्था की विभिन्न प्रणालियाँ देखी जाती हैं, जिनमें नारद जैसे मुख्य आचार्य ने योगदान दी। आस्था प्रवाह ने राजनीतिक प्रभाव भी brought हैं, in which गुण रहित ईश्वर की आराधना का अलग स्थान है। यह लगातार प्रगति करता रहा है, और आज भी हिन्दू परम्परा का एक महत्वपूर्ण अंश है।